कोयला सवार- महुआ माजी

कोयला सवार- महुआ माजी

सुंदर सर्पीली पहाड़ी ढलानों से 
गुज़रते हैं सैलानी

बलखाती नदी
सरसराते पत्ते
साल शीशम, करंज
खिलते फूल
पलाश, महुआ, सखुआ
मोहते हैं उन्हें


खीझ उठते हैं वे
जब बीच में आ जाता है 
कोयले की अनगिनत बोरियां लादे
कोयले के रंग-सा कोई साइकिल सवार

उस दुर्गम घाटी की चढ़ाई चढ़ता 
धीरे-धीरे भारी कदमों से 
साइकिल को खींचता 

हांफता-खांसता
पसीना पोंछता
गर्दन पर पड़े
किसी पपड़ाए नमकीन गमछे से
आपादमस्तक
कोयले की कालिख से पुता हुआ
वह साइकिल सवार


सैलानी नहीं जानते 
जानना भी नहीं चाहते
कि कौन है यह आदिमानव
कि कहां से और क्यों 
किस सदी से चला आ रहा है
बोझ उठाकर
कोयले की भारी बोरियों को
जंगली लत्तरों की रस्सी से बांधकर
जबरदस्ती
पुरानी जर्जर साइकिल पर लादकर
अनंत काल तक चलने के लिए...

कि कहीं दूर किसी पहाड़ी की
तराई या चोटी पर
पड़ा होगा कोई खदान
परित्यक्त
वीरान

कि अंधेरी रातों में
जब आप हम
फरमा रहे होते हैं आराम
होते हैं गहरी सुकून-भरी नींद में

फावड़ा, गैंता, हथौड़ा थामे
दबे पांव प्रवेश करता है वह 
किसी बंद खतरनाक सुरंग में

कि क्या पता कब चाल धंस जाए 
और अवैध खनन के आरोप में
जेल जाने के भय से
घर वाले भी भाग जाएं ?

बड़ी मशक्कत से बाहर निकाली गई/
उसकी क्षत-विक्षत लाश को
पहचानने से ही कर दे इनकार
वही परिवार
जिनके लिए करता रहा है वह
यह हाड़-तोड़ रोजगार

कि हथौड़े का एक-एक वार
दीवारों के बदले सीधे पड़ता है
खदान के बाहर भयभीत खड़ी
उस औरत के सीने पर
जो अपनी पीठ पर बेतराए  बच्चे
और उम्मीद की बोरी हाथ में लिए
खड़ी रहती है पहरे पर

कि पता नहीं कब ऊपर का मलबा
कोयला सहित गिरकर
समाधि बन जाए
उसके पति की
वह हमेशा के लिए
हो जाए बेवा
और हो जाए उसके 
बच्चे अनाथ

पौ फटने को है
और शहर है काफी दूर
मगर साइकिल में 
दो बोरियां लद सकती हैं अभी भी

रुको
गैंता, बेलचा और हथौड़ा
दो मुझे
थोड़ा और निकाल लाता हूं कोयला
काला सोना
कुछ पैसे ज्यादा मिलेंगे

अगले लगन में करनी है न बिटिया की शादी?
बाबुजी का ऑपरेशन?
चुकाना भी तो है महाजन का
पुराना दो पीढ़ी लंबा कर्ज?

एक तरफ जल रहा है पेट
दूसरी ओर धधक रहे हैं कोयले 
बगल की खदान में लगी आग से
जल रही हैं आंखें
फूल रही हैं सांसे
खांसते-छींकते
आंखे मलते
बोरियों में भरे जा रहे हैं कोयले
सुरंग के भीतर-बाहर

क्या फ़र्क़ पड़ता है जो
अगले ही पल धंस जाए छप्पर
दब जाए वह
और उसका परिवार
कोयले के नीचे वे भी बन जाए कोयला
कुछ सालों बाद

उन्हें भी एक-एक कर चुनने आए कोई
कोयले की तरह
बोरियों में भरकर 
ले जाए शहर बेचने
कोई और साइकिल सवार?

- महुआ माजी

Tags:

hindi kavita , kavita , कविता

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