17th Sep, 2026
वह रविवार का दिन था : गर्मी में डूबा एक दिन। वह एक सात साल की लड़की के पास आकर ठहर गया दिन था। उस दिन, पहली बार उस लड़की को अपनी नाक का आकार कुछ अजीब-सा लगा था। वह नहाकर आईने में अपने को देख रही थी। अचानक वह अपने नाक को गौर से देखने लगी। नाक उसके गीले बालों और गीली भौंहों के नीचे से उसे देखती मुस्कुरा रही थीं। यह बिल्कुल दोस्ताना मुस्कुराहट थी। उसमें कोई छल-कपट नहीं था। लड़की अपने नाक की मुस्कुराहट के जवाब में मुस्कुरा नहीं पायी। सात साल में यह पहली बार हुआ था। पहली बार लड़की को लगा, उसकी नाक पीछे से थोड़ी ज़्यादा दबी और सामने की ओर अजीब ढंग से फैली हुई है। अपने अँगूठे की ठीक बाजू वाली अंगुली से, नाक को ऊपर से नीचे तक छूते हुए, उसके दबे और उभरेपन को लड़की ने नापा। लड़की की अंगुली नाक में जितनी फिरती गई, लड़की की यह सोच उतनी पक्की होती गई कि उसने एक बेढंगी नाक के साथ सात वर्ष काट लिए हैं। यह बात उसे और नागवार लग रही थी कि उसे इसी नाक के साथ जीवन भर रहना है। यह सोचते ही उस दिन वह अपनी नाक को लेकर बहुत बेचैन हो गई। वह उस आईने के पास बार-बार जाकर अपनी नाक को निहारती रही और अपनी अंगुलियों से उसे इधर-उधर मोड़ देखती-परखती रही। समझें, यह इतना ज्यादा हो गया था कि उस रविवार उसकी नाक बहुत परेशान हो गई थी।
आखिरकार शाम तक वह यह बात सिर्फ अपने पास नहीं सहेज पायी। उसने तुरंत अपनी माँ को इस बात की शिकायत की, “मेरी नाक सुंदर नहीं है।”
माँ ने उल्टा पूछा था, “यह तुम्हें क्यों लग रहा है?”
“मैंने दिन भर अपनी नाक को ध्यान से देखा है…वह बिल्कुल सुंदर नहीं है…”
लड़की की माँ ने ध्यान से उसकी नाक को देखा था और मुस्कुराते हुए जवाब दिया था, “तुम्हारी नाक मुझे तो कहीं से भद्दी नहीं लग रही है…”
“ध्यान से देखो!” लड़की की आवाज में चिढ़ आकर बैठ गई थी।
“यह कुछ-कुछ मेरी नाक-सी है…मैं नहीं मानती मेरी नाक भद्दी है…मेरी इतनी उम्र हो गई है…किसी ने इसे अब तक भद्दी नहीं कहा है…” माँ ने कहा।
लड़की ने अपनी माँ की नाक को ध्यान से देखा। उसे लगा उसकी नाक, माँ की नाक से मिलती-जुलती-सी है।
“तुम बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो…! अपनी नाक के बारे में सोचना बंद कर करो…!” माँ ने लड़की को डाँटती-सी आवाज में कहा। लड़की ने अपनी माँ को घूर कर देखा जो वह किसी के भी डाँटने पर हमेशा करती थी और अपने कमरे में लौट गई।
बात आई-गई हो चुकी थी। लड़की की माँ, लड़की की नाक को कब का भूल चुकी थी। दिक्कत यह थी कि लड़की नहीं भूल पायी थी। उसे अपनी माँ की बात पर यकीन नहीं हुआ था जो यह कह रही थी कि उनकी नाक को किसी ने आज तक ‘भद्दी’ नहीं कहा है। लड़की को अपनी सात साल की उम्र में, अपनी नाक खटकी तो वह अब तक खटकती ही रही। वह जब भी आईने के सामने होती, सबसे पहले उसे अपनी नाक ही दिखती। वह जितनी बार आईना देखती, अपनी नाक को घूरती। लगातार कई वर्षों से उस लड़की के घूरने के कारण जो वह उसकी नाक इतनी परेशान हो चुकी थी कि अगर उसका बस चलता तो वह उसके चेहरे को छोड़ भाग जाती!
लड़की 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई थी। वह उस पीढ़ी के बीच के वर्षों की पैदाइश थी, जिसे ‘जेन जी’ कहा जा रहा था : डिजिटल नेटिव्स। वह 2003 में पैदा हुई थी। वह अपनी घोषित पीढ़ी के वर्षों के साथ, नौ बरस की उम्र तक रही। उसके बाद उसने ‘जेन अल्फा’ के समय को छू लिया था। अभी उस लड़की की उम्र, अपने बाद की पीढ़ी ‘जेन अल्फा’ के अंतिम वर्ष 2025 को छू रही रही थी। जबकि ‘जेन-अल्फा’ से उसका कोई लेना-देना नहीं था। उसकी पैदाइश ‘जेन जी’ की थी। उसका स्वभाव ‘जेन जी’ का था। इसी स्वभाव के कारण, अपनी नाक को घूरते हुए, उसे कई बरस हो चुके थे। उसकी नाक अब उस लड़की के घूरने की आदी हो चुकी थी। लड़की के घूरने से उसकी नाक को अब कोई फर्क नहीं पड़ता था।
इस लड़की ने अपनी बाईस साल की उम्र में तीन नौकरियाँ कर ली थीं। नौकरियों को उसने अच्छे अवसर के कारण नहीं बदला था। पिछली दो नौकरियाँ उसने अपनी नौकरी के शुरुआती बरस में ही छोड़ दी थीं। इस दो नौकरियों को, नौकरी की जगह पर किसी बात या आदमी के पसंद ना आने पर उसने छोड़ी थीं। पहली नौकरी उसने इसलिए छोड़ी थी कि उसका बूढ़ा बॉस पाइप पीता था, जिसकी वजह से उसकी केबिन, पाइप के तंबाखू की गंध से भरी रहती थी। लड़की को केबिन में बार-बार आना पड़ता था। केबिन में भरी तंबाखू की गंध लड़की को पसंद नहीं थी। दूसरी नौकरी में उसकी बॉस एक अधेड़ औरत थी, जिसके चेहरे पर ढेरों मुँहासे थे। जब वह बात करती थी तो उसकी बातों से उपजी कड़वाहट से उसके मुँहासे फूटने लगते थे। लड़की को फूटते मुँहासे देखना, नापसंद था, इसलिए लड़की ने वह दूसरी नौकरी भी छोड़ दी थी।
इन दोनों नौकरियों को छोड़ने में उसे एक बरस का समय भी नहीं लगा था। यह मामला कुछ-कुछ उसकी नाक की नापसंदगी-सा ही था। नाक को वह छोड़ नहीं सकती थी। नापसंदगी में नौकरी छोड़ना आसान था और उसने यह किया था। उसके पिता एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी थे। माँ भी दो साल बाद अपने बैक की नौकरी से रिटायर्ड होने वाली थीं। तो उनके पास, ऐसी कोई वजह थी नहीं थी कि लड़की की नौकरी ना रहने से उनका घर नहीं चलेगा। इसलिए उसके माँ और पिता दोनों उसके दो बार नौकरी छोड़ने को लेकर चौंके भर थे। उन्होंने कोई चिंता नहीं की थी। लड़की से कहा भी कुछ नहीं था। लड़की होशियार थी। उसे नौकरी की कमी नहीं थी। तीसरी नौकरी में वह इन दिनों थी। यह अलग बात थी कि वह जिस तीसरी नौकरी में थी उसे वह कभी भी छोड़ सकती थी। यह बात जितना वह जानती थी, उसके माँ-पिता भी जानते थे।
इस लड़की ने जब वह पंद्रह साल की थी, तब एक दुपहर जब उसका स्कूल छूटा, उसने स्कूल के सामने एक तोता बेचते आदमी को देखा। स्कूल के बच्चे उसे घेरे हुए थे। उसके पास तोतों के कई पिंजड़े थे। पिजड़े तोतों की आवाज और उनके हरे रंगों की हलचल से भरे हुए थे। लड़की मुग्ध-सी तोतों को देखती रह गई थी। वह कब पिजड़ों के पास नीचे बैठ गई, उसे पता ही नहीं चला। तोतों को देखते एक बार उसके भीतर यह इच्छा जागी थी कि सारे बच्चे मिल कर पिंजड़े के उन छोटे-छोटे दरवाजों को खोल दें जो तोतों के पिंजड़े से बाहर आने में बाधा हैं। खोलें और उड़ते हुए तोतों को देखें! देखें की आसमान उनके हरे रंगों से भरता है या नहीं? इस जागी हुई इच्छा के तुरंत बाद उस लड़की को यह लगा कि तोते पिंजड़े में ही ठीक है। पिजड़े में रहेंगे तो घर में रखे जा सकेंगे।
लड़की तोतों के एक-एक पिंजड़े को ध्यान से देख रही थी। फिर उसकी नजर एक तोते पर अटक गई जो उसे सबसे सुंदर लग रहा था। तोता अपनी गरदन में एक काली लकीर और हरे पंखों में लाल रंग की लंबी पट्टी लिए हुए था। तोते की गर्दन के पीछे पंख-सा ही लाल रंग छपा हुआ था, जैसे किसी ने अपनी अँगुली लाल रंग में डुबोकर उसकी गर्दन में फेर दी हो। उस तोते की नस्ल सिकंदर महान के कंधों पर बैठकर, हिंदुस्तान से यूरोप गई थी। लड़की को यह बात पता नहीं थी। यह बात तोता बेच रहे आदमी को भी नहीं पता थी। वह उस तोते का नाम पहाड़ी तोता बोल रहा था। तोते वाला उसकी बहुत-सी विशेषताएँ बता रहा था। कि वह तोता बहुत तेज होता है। कि वह किसी पेड़ पर बिल्ली की तरह चढ़ सकता है। कि उसकी उम्र बीस से पच्चीस साल लंबी होती है। कि वह शांत बुद्धिमान और सीखने वाला प्राणी है। कि वह शरीर से मजबूत और तोतों में सबसे बड़ा होता है। कि वह तेज उड़ता है, इतना तेज कि उड़ना चाहे तो एक घंटे में वह चालीस किलोमीटर की लम्बी दूरी नाप लेता है। तोता वाला लगातार बोलता जा रहा था और तोते की खूबियाँ खत्म नहीं हो रही थीं। उसने तोते वाले से उसका दाम पूछा। वह उसे बहुत महँगा लगा। तोते वाले ने लड़की के असमंजस को समझा। उसने कहा कि इसी नस्ल का छोटा तोता कम कीमत में है। वह तोता जिसका पिंजड़ा तोते वाले ने अपने पीछे कहीं से खींचकर निकाला और लड़की के सामने कर दिया। वह बिल्कुल भी उस बड़े तोते-सा नहीं दिख रहा था, जिसे लड़की ने पहले पसंद किया था। वह एक नन्हा जीव था। उसकी उम्र मुश्किल से एक-डेढ़ महीने रही होगी। उसकी देह पर रोएँ और पंख बिल्कुल तोते जैसे ही थे। वह उस लड़की को पसंद आए तोते का लगभग छोटा रूप माना जा सकता था। लौटते हुए वह लड़की उस तोते के छोटे रूप को खरीद लाई जिसे तोता बेचने वाला पहाड़ी तोता कह रहा था जो सिकंदर महान के नाम से भी जाना जाता था : एलेक्ज़ेन्ड्राइन।
लड़की के साथ तोता देख उसकी माँ चौंकी। फिर पिता चौंके थे। लड़की ने तोता खरीदने से पहले उनसे पूछने की कोई जरूरत नहीं समझी थी। लड़की माँ-पिता को अपनी हरकतों से इसी तरह चौंकाती रहती थी। उन्हें उससे चौंकने की अब तक आदत हो चुकी थी। माँ चिल्लाई थी। माँ को लग रहा था, लड़की तोता पालकर घर में उसका काम बढ़ा रही है। पिता चुप रहे। उन्हें अपनी लड़की और उस तोते में ज़्यादा अंतर नहीं दिख रहा था। यह नहीं दिखता अंतर आगे जाकर सच साबित होने वाला था कि लड़की और तोता एक जैसे हैं। इस तरह उस छोटे से परिवार, जिसमें माँ, पिता और एक बेटी भर थे—तोता चौथा सदस्य बन गया। समय लगा पर धीरे-धीरे उस तोते के रंग उस पूरे घर में फैल गए। तोते की हरी छाया इतनी घनी हुई कि सबसे पहले वह लड़की उसमें डूबी, फिर डूबी उसकी माँ और आखिर में लड़की के पिता भी उस हरी छाया में डूबने से नहीं बच पाए। वे तीनों मिल-जुल कर तोते को किसी बच्चे-सा पाल रहे थे। वे तीनों तोते की हरी छाया में डूब गए थे और हरे-हरे दिखने लगे थे।
अब उस तोते को लाए और उसका नाम रखे दो बरस से कुछ अधिक हो चुका था। तोता अपने नाम की पुकार को पहचानता था। तोता घर के भीतर, अपने पिंजड़े के घर में अब ज्यादा नहीं रहता था। वह पिंजड़े से बाहर उड़ता-फिरता रहता था–इधर से उधर। लड़की के पास से वह भय अब खत्म हो चुका था जो तोते का उसे छोड़ उड़कर आसमान को चुन लेने का था। तोते की बीट घर की किसी भी जगह और वस्तु पर मिलने लगी थी। तोता बेधड़क पूरे घर का इस्तेमाल कर रहा था।
लड़की सत्रह साल की हो चुकी थी। गर्मी के वैसे ही दिन थे। गर्मी के वैसे ही दिनों में, छुट्टी का वैसा ही कोई दिन था। ऐसे ही किसी दिन, दस बरस पहले लड़की को उसकी नाक भद्दी लगी थी। लड़की अभी-अभी नहा कर बाहर आयी थी। वह अपने बालों को पोंछते हुए अपनी नाक को देख रही थी। नाक वैसी की वैसी थी, जैसी रहकर सात बरस की उम्र से उसे खटक रही थी। रोज घूर-घूर कर लड़की के देखने के बावजूद, उसकी नाक इन दस वर्षों में रत्ती भर भी नहीं बदली थी।
जब लड़की आईने में अपनी नाक को देख रही थी, तभी तोता उसके दायें कंधे पर आकर बैठ गया। लड़की आदतन अपनी नाक को आईने में देखते हुए अपनी अंगुली उसके उतार-चढ़ाव पर फेर थी। तोता लड़की के कंधे पर बैठा उसकी नाक को ध्यान से देख रहा था। लड़की ने आईने में अपनी नाक को ध्यान से देखते तोते को देखा। लड़की की अंगुली के नीचे उसकी नाक बार-बार अपनी उभरती-छुपती रेखा के नीचे, अपने आकार के भीतर गहरी साँस लेती मौजूद थी और तोते के देखने को महसूस कर रही थी।
अचानक लड़की ने अपने कंधे पर बैठे तोते से पूछा, जो लड़की के सामने खुद उसके सहित आईने पर उसके कंधे पर बैठा मौजूद था और इधर-उधर अपनी मुंडी हिलाता लड़की को अपनी नाक को देखता दिख रहा था, “मेरी नाक सुंदर है?”
तोते ने अपनी मुंडी हिलाते दोहराया, “ मेरी नाक सुंदर है…?”
लड़की ने ‘मेरी’ को ‘तेरी’ सुना। सुना की ‘तेरी नाक सुंदर है’। लड़की खुश हो गई। उसने फिर अपना प्रश्न दोहराया और फिर तोते को सुना। लड़की ने ऐसा कई बार किया और हर उसने ‘तेरी नाक सुंदर है’ तोते से सुना। उसने तोते के इतने बार कहने के बाद, ध्यान से जब अपनी नाक को देखा तो दस साल बाद, पहली बार उसे अपनी नाक सुंदर लगी।
उस दिन से हमेशा उसके नहाकर आईने में अपना चेहरा देखते ही, तोता रोज कंधे पर आ जाता और उसका बोला जो लड़की को सुनाई देता वह ‘तेरी नाक सुंदर है’ ही होता था। इस तरह लड़की अब अपने तोते के कारण अपनी नाक के भद्दे होने के उस तनाव से बाहर आ गई थी जिसने उसे उसकी सात साल की उम्र में पकड़ लिया था। लड़की खुश थी। अचानक तोते के कहने से उसे अपनी नाक अच्छी लगने लगी थी।
उसके नहाते ही उसका तोता रोज उसके कंधे पर आ रहा था और आईने में लड़की की नाक को देखते ही कह रहा था, “तेरी नाक सुंदर है!”
तोते को यह कहने की आदत हो चुकी थी। लड़की को भी तोते के इस कहे को सुनने की आदत हो चुकी थी, तोते के जिस कहे में, उसकी नाक सुंदर थी।
अब तक उस जेन जी लड़की के लिए तोता, उसकी नाक को सुंदर बनाए रखने के लिए जरूरी हो चुका था। वह आठ साल से लड़की को रोज यह बात, उसके नहाने के बाद कह रहा था। लड़की अब पच्चीस की हो गई थी। अपनी नाक को लेकर उसके सारे संदेह अब लगभग मिट-खप चुके थे। यह उस तोते की वजह से ही था।
तभी एक घटना घटी, जिसे नहीं घटना था। हुआ यह कि लड़की को अपने माँ-बाप के साथ अपनी मौसेरी बहन की शादी में, तीन दिनों के लिए, दूसरे शहर जाना था। समस्या उनके नहीं रहने पर, घर में तोते कि देखभाल की थी। वैसे तो उस लड़की का तोता बहुत समझदार था। पर तोता कितना भी समझदार हो अकेले तो घर पर नहीं रह सकता था। शादी में तोते को लेकर जाना भी लड़की के पिता को ठीक नहीं लग रहा था। जिस घर की शादी में वे जा रहे थे, उनके घर कोई तोता नहीं था। लड़की अलबत्ता तोते को अपने साथ ले जाने के लिए तैयार थी। यह इस बात पर अपने माँ-पिता से जिद्द कर रही थी। जिद्द के पीछे यह बात थी कि शादी के उस घर में तोते के मुँह से, ‘तेरी नाक सुंदर है!’ सुनना उसे जरूरी लग रहा था।
लड़की के पिता तोते को यहीं छोड़कर जाने की जिद्द और कोशिशों पर थे। लड़की की माँ तोते को लेकर, कभी अपने पति और कभी अपनी बेटी की सोच के बीच इधर-उधर हो रही थी। तोते को छोड़ने की सबसे आसान जगह, उनके काम वाली बाई थी जो नई थी और उसके घर में कोई तोता नहीं था। उसने तोता अपने घर रखने से साफ मना कर दिया कि उसे तोते की देखभाल आती नहीं है…कहीं-कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो लेने के देने पड़ जाएँगे। बहुत समझाने पर भी वह तैयार नहीं हुई थी। इससे पहले जो औरत उनके घर काम करती थी, उसके घर एक तोता था और वह उनके तोते को खुशी-खुशी रख लेती थी। लड़की जानती थी कि उस औरत का घर उसके तोते को बिल्कुल पसंद नहीं होते हुए भी, उसका तोता उस औरत के तोते के साथ तीन-चार दिन किसी तरह काट लेता था। यह जरूर था कि वह उपहार में कुछ गालियाँ, उस औरत के तोते से सीख आता, जिन गलियों को उस औरत के बच्चे अपने तोते को सिखा चुके थे, जिसे भूलने में लड़की के तोते को बहुत वक्त लगता था।
फिर लड़की के माँ-पिता की उम्मीद एक बिल्डिंग छोड़ उस घर पर जम गई, जिसके यहाँ भी एक तोता था। वे लोग उनके घनिष्ट नहीं थे। मजबूरी थी। लड़की के पिता ने तो उस घर में जाने से कन्नी काट ली। लड़की की माँ, लड़की के साथ दोपहर के उस समय को चुन उस घर पर गई जो दोपहर का खाली समय होता है और बातचीत के लिए आसान होता है। जब वे दोनों उस घर के सामने पहुँचे तो उन्होंने उस घर पर एक बैनर लगा देखा, जिसमें सुनहरे अक्षरों में लिखा था—‘शादी का घर’। वह नवंबर से जनवरी तक फैला शादियों का मौसम था। लड़की की मौसी की घर की तरह कई घर, शादी में डूबे हुए थे। वही हुआ जो उस बैनर को देख लड़की की माँ के मन में जागा था। उस घर ने उन्हें साफ-साफ यह कहते हुए उनके तोते को रखने से मना कर दिया कि हम तो रख लेते, पर शादी का घर है किसी बच्चे ने पिजड़ा खोल दिया और तोता उड़ गया तो आप हमें ही दोष देंगे…हम तो खुद अपने तोते को शादी शुरू होने से पहले किसी को सौंपने की सोच रहे थे और सच कहें तो हमारे दिमाग आप लोग ही थे…। इस तरह लड़की के तोते को वह घर नहीं मिला। माँ-लड़की उस घर से निराश लौट आईं। अब उनके पास एक ही रास्ता था कि वे अपनी रिश्तेदारी की उस शादी में तीनों ना जाएँ, कोई एक रुक जाए। अगर जाएँ तो तोते को लेकर जाएँ। जो वे बिल्कुल नहीं चाह रहे थे कि जिस घर में उन्हें जाना था, उस घर के लोगों को पिंजड़े में बंद तोते पसंद नहीं थे। वे लोग तोतों को आसमान में उड़ता देख खुश होने वाले लोग थे।
उसी दिन शाम को लड़की के पिता ने उस आदमी से यह बात कही, जिसकी दुकान नियमित वह शाम को गपबाजी के लिये जाता था। दुकानदार रेल्वे में अधिकारी होकर रिटायर्ड हुआ था। लड़की के परिवार की कॉलोनी के ठीक सामने के कॉम्प्लेक्स में, अपने पिता के पैसों से एक दुकान खरीद, एक बड़े ब्रांड की आइसक्रीम, दूध, दही और जनरल सामान की दुकान उस रिटायर्ड आदमी के लड़के ने डाल रखी थी। इस दुकान में वह आदमी शुरू-शुरू में सिर्फ दोपहर में अपने बेटे को मुक्त करने और अपना समय काटने बैठता था। बाद में उस आदमी को यह पता नहीं चला कि कब उसका समय बढ़ता-बढ़ता दुकान में फैलता गया है। उस चार साल पहले रेल्वे से रिटायर्ड हो गए आदमी को उस शाम के अलावा पूरे दिन तक फैल गए दुकान के समय पर कोई एतराज नहीं था। उसका बेटा जो तोते वाली लड़की की तरह ही पैदायशी जेन-जी था, वह शहर में दुकान छोड़ पता नहीं क्या खोजता घूमता रहता था जो उसे अब तक मिल नहीं पाया था। अपने बेटे की ‘पता नहीं क्या’ की खोज पर उस आदमी ने कुछ महीनों की टोकाटाकी के बाद, अब ध्यान देना बंद कर दिया था। बेटे की दुकान में बैठने से उसका रिटायर्ड-समय अच्छे से कटने लगा था। उसकी अपने हमउम्र कई ग्राहकों से पहचान हो चुकी थी। लड़की के पिता जैसे कई बुजुर्ग उसके पास आते थे और अपनी ज्ञान की सीमाओं को अनंत मानते हुए उस दुकानदार से दुनिया भर की बातें करते और उनका समय अच्छा कटता जाता था।
उस दुकानदार ने जो एक सीधा-सादा आदमी था। जिसके पास बस पाँच फुट पाँच इंच का कद, और गोरे की ओर झुका थोड़ा साँवला-सा रंग था। वह अपनी ना दुबली और ना मोटी, बस ठीकठाक देह पर ढीली-सी चौड़े मोहरी वाली पतलून के ऊपर, हमेशा ढीली-ढाली कोई सादी-सी शर्ट पहना रहता था। कुल मिलाकर उसके पहनावे से उसका कभी अधिकारी होना लापरवाही से झाँकता रहता था। वह बोलता कम था और सुनता ज़्यादा था। पर कभी बोलना शुरू करता तो बात के खत्म होने तक लगातार बोलता रहता था, तब उसे उसके बोलते, बीच में कुछ बोल, उसे चुप कराना मुश्किल हो जाता था। पर ऐसा होता कभी-कभी ही था। आमतौर पर वह लोगों को चुपचाप सुनता दिखाई देता था। वह अपने दोनों हाथों को कमल के फूल की पंखुड़ियों की तरह अपने कंधे तक बार-बार उठाते हुए, उनकी बातों पर एक-दो शब्दों में, आश्चर्य प्रगट करता रहता था।
लड़की का पिता बिल्कुल इस दुकानदार से विपरीत था। वह एक मोटा और गहरा साँवला आदमी था जो गहरे चटक रंगों के कपड़े पहना रहता था। वह ज्यादातर टी-शर्ट और जींस पहनता था। उसकी जींस बहुत ज्यादा बाहर आ गए उसके पेट को, बमुश्किल एक चमड़े के बेल्ट के सहारे, उसके लिए सम्हाले रखती थी। वह कहीं जाता तो उसकी देह के बाकी हिस्से से पहले उसका पेट जाता दिखता था। दुकानदार से विपरीत उसके सफेद हो चुके बाल काले रंगे थे और उम्र को धोखा देते अब तक बचे हुए थे। लड़की का पिता जहाँ खड़ा या बैठा दिखता, लोग उसे सुनते हुए दिखाई देते। यह उसकी खूबी थी और यह उसकी खामी भी थी। वह बोलता बहुत था।
जब लड़की के पिता से उनके तोते की समस्या दुकानदार ने सुनी तो उसने कहा, “आप चिंता ना करें! मेरा यहाँ दो तोते हैं…तीसरा आपका भी रह लेगा।”
“बस तीन दिन आप सम्हाल दें…हम चौथे दिन सुबह लौट आएंगे!” लड़की के पिता ने उस दुकानदार के तोता रख लेने की सहमति से अपने भीतर उपजी खुशी को भीतर ही भीतर दबाते हुए कहा।
“अरे कोई बात नहीं…हम एकदूसरे के काम नहीं आएँगे तो कौन आएगा!” दुकानदार अच्छा आदमी था। उसकी तोते को रखने की सहमति ने लड़की के पिता को चिंता मुक्त कर दिया था।
“कल जाने से पहले मैं उसे आपके पास ले आऊँगा…मैंने आपका घर देखा नहीं है…नहीं तो सीधे वहीं पहुँचा आता…” लड़की के पिता की भीतर दबी खुशी अब उसके चेहरे पर उभर आयी थी।
“अरे नहीं, उसकी जरूरत नहीं है, जब मैं दोपहर खाने के लिए घर जाऊँगा उसे ले जाऊँगा!” दुकानदार ने कहा।
इस तरह लड़की का वह तोता जो नहाने के बाद रोज लड़की को ‘तेरी नाक सुंदर है’ कहता था। उस दुकानदार के घर पहुँच गया जो पूरी तरह दुकानदार नहीं था और जो रिटायर्ड होने के बाद अब धीरे-धीरे अपना कभी अधिकारी होना खोता जा रहा था। जिसे अब सुबह दुकान खोलकर कभी-कभी सफाई वाली के ना आने पर, दुकान में झाड़ू-पोंछा करते भी देखा जा सकता था।
तोते को पहुँचाने लड़की अपने पिता के साथ दुकान तक आयी थी, जैसे वह यह तौलना चाह रही हो कि तोता जिसके पास जा रहा है, वह तोते के लायक है या नहीं। दुकानदार को देख और बात कर वह आश्वस्त हुई कि उसका तोता उनके घर के दो तोतों के साथ तीन दिन खुश-खुश रह सकता है। दूसरी बात लड़की को यह अच्छी लगी कि दुकानदार के घर में उसके तोते की भद्दी गालियों को सीखने का कोई खतरा नहीं था। वह मान रही थी की दुकानदार के तोते हिन्दी में भद्दी गालियाँ नहीं बकते होंगे। लड़की को अंग्रेजी की गलियाँ भद्दी नहीं लगती थीं जो उसका तोता उससे सीख चुका था।
दुकानदार के लिए, लड़की के चेहरे पर अपने पिता-सा ही आभार जागा था। वैसे बहुत ध्यान से देखने पर उसके चेहरे पर जागा आभार वैसा नहीं था, जैसा उसके पिता के चेहरे पर जागा हुआ आभार सच में था। लड़की जेन जी थी। जेन जी के चेहरे पर आभार उभरते ही मिट जाया करता था। लड़की के पिता के चेहरे पर उभरा आभार बहुत देर टिका रहा जो उसके बोलने पर भी बार-बार उभरता रहा। लड़की को यह कुछ-कुछ अटपटा-सा लग रहा था, पर लड़की ने अपने पिता से कुछ कहा नहीं। वह भीतर ही भीतर मंद-मंद मुस्कुराती रही।
दूसरे दिन उस रिसॉर्ट के अपने कमरे में, नहाकर निकलते ही लड़की को अपने तोते की याद आयी, जहाँ वह अपनी मौसेरी बहन की शादी पर रुकी हुई थी। उसने अपने पिता से दुकानदार का नंबर माँगा। वह वीडियो कॉल कर तोते से बात करना चाहती थी। पहले उसके पिता ने लड़की की इच्छा अपने दुकानदार दोस्त से फोन में कही। वह दोपहर को छूता समय था, जब लड़की नहा कर बाहर आयी थी और उसे अपने तोते की याद आ गई थी। दुकानदार उस समय अपने घर पर था। वह तोते से लड़की की वीडियो कॉल पर बात कराने खुशी-खुशी तैयार हो गया। सच कहें तो उसे लड़की का तोते से इतना गहरा प्रेम देख अच्छा लग रहा था। लड़की ने आईने के सामने खड़े होकर वीडियो काल किया। दुकानदार के मोबाइल पर तोता दिखा। तोते से लड़की ने पूछा, “मेरी नाक अच्छी है?”
दूर बैठे तोते ने अपने पिंजड़े के भीतर से कहा, “तेरी नाक अच्छी है!” लड़की के लिए यह जरूरी था। उसे अपनी मौसेरी बहन की शादी में सुंदर दिखना था।
लड़की ने अपने पिंजड़े में बंद तोते को ध्यान से देखा। लड़की को दूसरे के घर पर पिंजड़े में अपना तोता उदास दिखा। उसने तोते का नाम लेकर कहा, “जल्दी आ जाएँगे…खाओ-पीओ और मस्त रहो!”
तोते ने भी कहा, “खाओ-पीओ मस्त रहो!”
फिर लड़की कुछ-कुछ और अपने तोते से बतियाती रही। बतियाती रही तब तक। जब तक, खुद अपने तोते के हरे रंग में डूब, तोता नहीं हो गई तब तक।
दुकानदार के घर तोते का वह दूसरा ही दिन था। एक दिन पहले ही अपना तोता दुकानदार को पिता-बेटी ने सौंपा था। इस दूसरे दिन ही लड़की ने वीडियो कॉल पर अपने तोते से बात की थी। लड़की से बात कर कुछ हुआ या दूसरे घर में तोता बेचैन था जो भी हुआ हो। लड़की का तोता शाम के किसी समय पिजड़ें में लगे जाली के दरवाजे को अपनी चोंच से ऊपर उठाकर उड़ गया। अपने पिंजड़े को अपनी चोंच से उठाकर खोलने का यह काम लड़की का तोता, लड़की के घर में पिंजड़े से बाहर आने के लिए करता रहता था। यह अलग बात थी कि वहाँ वह घर के भीतर ही उड़ता रहता। इस कमरे से उस कमरे। इस जगह से उस जगह। इस कंधे से उस कंधे। दुकानदार के घर में लड़की का तोता अपनी आदत से बाहर आ गया था। वह उस घर को छोड़ उड़ चुका था।
जब तोते का पिंजड़ा घर को खाली दिखा तो दुकानदार के घर ने, घर भर खोजा लड़की के तोते को। उस घर ने एक खाली हो गए पिंजड़े को देख, अपने दो तोतों को, उड़ने के लिए फड़फड़ाते और अपने-अपने पिजड़े के दरवाजों पर चोंच मारते पाया पहली बार। पहली बार घर के तोते, लड़की के उड़ गए तोते के पीछे, उड़ने को बेचैन दिखे।
सच तो यह था कि लड़की का वह उड़ गया तोता, बिल्कुल अपनी मालकिन उस जेन जी लड़की-सा ही था। यह कोई नहीं कह सकता था कि एक जेन जी लड़की के साथ रहने से वह जेन जी जैसा था या जेन जी वर्ष में अपनी पैदाइश के कारण वह वैसा था। तोते को भी उस लड़की की तरह बहुत गुस्सा आता था। गुस्से में वह इतनी तेजी से अपने पंख फड़फड़ाने लगता कि उसके पंखों की फड़फड़ाहट के शोर में घर डूब जाता था। वह अपने पंखों का शोर किसी बात के ना पसंद आने पर करता था और वह कोई छोटी से छोटी बात हो सकती थी— जैसे उसके खाने-पीने से जुड़ी हुई या पिजड़े से बाहर आने की उसकी इच्छा से जुड़ी हुई…उस तोते के लिए यही बातें बड़ी बातें हो जाती थीं। लड़की के इस तोते की लाल चोंच के नीचे उसके चेहरे में हरे रंग में डूबा एक चिढ़ का भाव हमेशा मौजूद रहता था। यह स्थायी भाव तोते के चेहरे में उस लड़की के चेहरे की नकल से ही आया था। लड़की के चेहरे पर चिढ़ का यह स्थायी भाव, अपने माँ-बाप या दूसरों के सवालों का चिढ़-चिढ़कर जवाब देते-देते, बरसों में चेहरे पर उपजी चिढ़ था। लड़की का तोता, लड़की के माँ-बाप से ज्यादा लड़की से प्रभावित था–इसमें कुछ गलत नहीं था। लड़की की तरह ही लड़की के तोते को भी, लड़की के माँ-बाप की बात नहीं मानने या सुनने में मज़ा आता था–यह जरूर गलत था।
दुकानदार के घर ने जो नहीं देखा था वह यह था कि लड़की के तोते ने पिजड़े के जाली वाले दरवाजे को उठाकर उड़ने से पहले देर तक अपने पंख फड़फड़ाए थे। उसने पंखों के शोर से दुकानदार के उस घर को भर दिया था, जहाँ उस जेन जी लड़की के बिना उसे छोड़ दिया गया था। बस यह हुआ था कि उसकी पंखों की बेचैनी को सुनने के लिए, दुकानदार के घर में उस समय उस कमरे में कोई नहीं था। थे बस दुकानदार के वे दो बूढ़े तोते। बूढ़े तोते जेन जी वर्ष के नहीं थे। वे तोते, लड़की के तोते से उम्र में बहुत बड़े थे। वे अचंभे से युवा तोते के गुस्से में फड़फड़ाते पंखों को देखते रहे थे बस। वे अपने-अपने पिजड़ों में बंद थे। वे कर कुछ नहीं सकते थे। उन्हें उस युवा तोते के पंखों की बेवजह फड़फड़ाहट समझ ही नहीं आ रही थी। अपने बाजू से पिंजड़ा खोल उड़ गए युवा तोते को, बूढ़े तोते अपनी चोंच खोले आश्चर्य से बस देखते रह गए थे।
उस युवा तोते के उड़ जाने के बाद, उन बूढ़े तोतों ने अपने पंखों में उड़ने की फड़फड़ाहट महसूस की और अपने-अपने पिंजड़े के जालीदार दरवाजे को अपनी-अपनी चोंच से ऊपर उठाकर खोलने की कोशिश भी की। दुकानदार के घर के तोतों के पिंजड़े बूढ़े थे। उनके दरवाजों में जंग लग चुकी थी। वे खुलने को लेकर आसान नहीं थे। समझे कि दुकानदार के वे दोनों तोते, अपने पंखों की बेचैन फड़फड़ाहट और अपने-अपने पिजड़े के दरवाजे को खोलने की असफल कोशिश के तुरंत बाद, उस भाग गए युवा तोते को भूल गए थे।
लड़की ने रिसॉर्ट से दूसरे दिन सीधे दुकानदार को फोन किया। ठीक उस समय, जिस समय उसकी कल अपने तोते से बात हुई थी। वह नहाकर निकली थी और तोते से अपनी नाक के बारे में पूछना उसके लिए जरूरी हो गया था।
फोन पर उस बूढ़े दुकानदार ने कहा, “आज वह खाने घर नहीं गया है…अगर घर इस बीच जा पाया तो तोते बात करा देगा!”
दुकानदार ने यह झूठ अपने घर में खाना खाते हुए, मुँह के कौर को पूरी तरह गटक कर लड़की से बोला था। जब वह इस झूठे वाक्य को बोल रहा था तो वह खाली पिंजड़ा उसके सामने था, जिसका दरवाजा उठाकर लड़की का तोता उड़ गया था। उस सीधे और बूढ़े दुकानदार की यह हिम्मत ही नहीं हुई कि वह लड़की को तोते के उड़ जाने का सच बता दे। लड़की अपने तोते पर उसे इतनी पागल लग रही थी कि वह चाहकर भी उससे सच नहीं कह पाया। उसने यह तय किया था कि उनके लौटने के बाद, वह लड़की के पिता से सबसे पहले तोते के उड़ जाने का सच कहेगा। उसे उम्मीद थी वे समझ जाएँगे। तोते उड़ते ही हैं कभी ना कभी। पिंजड़े को कभी ना कभी तोते नापसंद करते ही हैं। बूढ़े दुकानदार ने यह भी सोचा था कि लड़की के तोते की उम्र का एक तोता, लड़की की पसंद से उसे दिला देगा, जिससे लड़की के तोते के उड़ जाने का दुःख कुछ कम हो सके। उसने यह भी तय किया था कि अभी चुप रहेगा, जिससे वह खुशी कम ना हो जो शादी में शामिल होकर–लड़की, उसके पिता और उसकी माँ को मिल रही थी। दुकानदार भला आदमी था। उसने तोते को रख, उन लोगों की सहायता की थी और अब फँस चुका था।
लड़की बेचैन रही। शाम तक उसने तीन बार बूढ़े दुकानदार को फोन किया और तीनों बार उसने सुना कि वह आज घर नहीं जा पाया है कि उसका लड़का किसी काम में फँस गया है और आज दुकान आया ही नहीं कि वह उसके भरोसे दुकान छोड़ घर जा सके। बूढ़ा दुकानदार बहुत दिनों बाद ऐसे नाजुक झूठ बोल रहा था, जिससे उसकी आवाज कुछ ऐसी हो गई थी कि लड़की को लगने लगा, जरूर कुछ गड़बड़ है। लड़की ने अपने पिता से अपने इस संदेह को कहा। पिता ने दुकानदार को फोन किया। उसने वही बात उनसे की जो उसने लड़की से की थी। पिता को लड़की के संदेह में दम लगा। उससे बात करते उनके उस दोस्त दुकानदार की आवाज़ और ज्यादा उस तरफ गिर गई थी, जहाँ से वह और ज्यादा ‘कुछ तो गड़बड़ है’ जैसी लग रही थी। जाहिर है पिता अपनी लड़की के उस पागलपन को समझता था जो इतने वर्षों से उस तोते के साथ रहते, तोते के लिए, उस लड़की के भीतर पनपा हुआ था। पिता ने लड़की से बस इतना कहा, “कहीं कोई गड़बड़ नहीं है…वह आज अपने घर नहीं जा पाया है…उसका लड़का दुकान से ऐसे गायब होता रहता है…इसमें कोई नई बात नहीं है…उसके लड़के का रोना मैं उससे पहले भी सुन चुका हूँ…उसने कहा है, वह दुकान बंद कर घर पहुंचते ही रात में ही तुमसे तोते से बात करा देगा!”
लड़की ने दुकानदार के वीडियो कॉल का दस बजे तक इंतजार किया। फिर उसे फोन लगा दिया। लड़की यह फोन बस इस सूचना के लिए था कि वह वीडियो कॉल कर रही है। क्योंकि सीधे वीडियो कॉल करने पर दुकानदार फोन उठता नहीं था। दुकानदार ने कहा कि ‘नेट’ काम नहीं कर रहा है, इसलिए वीडियो कॉल पर तोते से बात कराना मुमकिन नहीं है। लड़की को कुछ अजीब लगा। लड़की के पास अपने पिता की उन बातों का आश्वासन था जो अपने उस दुकानदार दोस्त से बात करने के बाद उसने उसे दिया था। पिता की बातों के आभास में, लड़की ने दुकानदार की इस बात पर भरोसा कर लिया कि उसके घर ‘नेट’ काम नहीं कर रहा है। इस भरोसे के बावजूद लड़की ने अपने भीतर उस अजीब-सी बेचैनी को महसूस किया जो किसी चीज के खो जाने पर होती है।
तीसरे दिन अपने नहाने के बाद, जब लड़की ने दुकानदार को फोन मिलाया तो घंटी जाती रही, पर उस तरफ से फोन नहीं उठाया गया और ना ही ‘मिस कॉल’ के जवाब में, उधर से कोई फोन आया। लड़की ने तोते से जो उसे विडियो कॉल में दिखता और उससे ‘तेरी नाक सुंदर है’ कहता बिना सुने, बड़ी मुश्किल से अपने को उस दिन, अपनी नाक को आईने में देखने से रोका। वह अपने गीले और अनसुलझे बालों के साथ पलटी कि अपने पिता को बता सके कि उसका दुकानदार दोस्त अब फोन ही नहीं उठा रहा है। पिता से मिलने उसे रिसॉर्ट के उस कमरे से बाहर आना पड़ा, जिसके बरामदे पर उसका पिता सिगरेट पीता निश्चिंत बैठा था। वह लड़की की माँ को कोई उपदेश देता दिख रहा था। उपदेश के कुछ शब्दों को सुन लड़की को लगा कि यह उपदेश उसकी मौसी यानि उसकी माँ की बहन की बुराई-सा कुछ है।
लड़की ने माँ के लिए, पिता की उस अजीब उपदेश से भरी आवाज को भेदते हुए तेजी से कहा, “तुम्हारा दोस्त अब फोन ही नहीं उठा रहा है…जरूर कुछ गड़बड़ है…साला मेरे तोते को कुछ हुआ तो मैं उस तुम्हारे दोस्त को छोड़ूँगी नहीं!”
“फालतू बात मत कर…बूढ़ा आदमी है…हो सकता है फोन भूल आया हो…मैं ही अपने फोन भूल जाता हूँ…जानती नहीं क्या?” पिता ने कहा। पिता को इस बात की चिढ़ हुई की उस लड़की ने उसकी पत्नी से की जा रही उस बातचीत को, जिसमें उसे मज़ा आ रहा था, अपने वाक्यों से गिरा कर बिखेर दिया था और अब उसे समेटना उसके लिए मुश्किल हो चुका था।
लड़की अपने पिता की बात सुन एक बार पिता को घूर देखी। कुछ सोचा। फिर शांत हो कमरे में वापस लौट गई। उसी शाम उन्हें अपने शहर वापस निकलना था। बस एक रात की बात थी। कल सुबह वे अपने घर पहुँचने वाले थे। लड़की ने कल तक लिए संतोष रखना ठीक समझा। उसके पास अब कोई रास्ता बचा भी नहीं था।
सुबह जब वे अपने घर वापस पहुँचे तो वह इतनी जल्द सुबह थी कि उन्हें वह दुकान बंद दिखी जिसके दुकानदार ने उनका तोता रखा था। लड़की कुछ कह पाती उससे पहले ही टैक्सी की सामने की सीट पर बैठे लड़की के पिता ने मुड़कर लड़की की ओर देखते ही कहा, “वह दुकान नौ बजे खोलता है, मैं आ जाऊँगा…तुम्हारा तोता दस बजे से पहले तुम्हारे पास होगा…!”
लड़की अपने पिता की बात सुन, सिर झुककर एक उदास-सी हामी भरी। लड़की को बुरा लगा कि पिता ने उसके तोते का नाम नहीं लिया था। तोते का नाम ‘पिकू’ था जो उस लड़की का रखा नाम था, जिसे रखे दस बरस हो चुके थे और जिस नाम से उसे घर में बुलाया जाता है : उसकी जगह पिता ने उसे ‘तोता’ कहा था।
पिता चिढ़कर ही लड़की के तोते को उसके नाम की जगह कभी-कभी ‘तोता’ कहता था। चिढ़ने की वजह जायज थी। लड़की का पिता दोपहर का खाना खाकर, एक नींद के लिए तखत पर रोज लेटता था। उसके गहरी नींद में जाते ही उसके उठते खर्राटों को सुन, लड़की का तोता घर में जहाँ भी होता, वहाँ से उड़कर उसके पेट पर आकर बैठ जाता था। पेट उसे किसी ऊपर-नीचे होते पहाड़-सा लगता। वह उसपर फुदकते हुए अपनी आवाजों से लड़की के पिता की गहरी नींद को छेद देता था।
लड़की का पिता ठीक नौ बजे अपने घर से निकला। अपने दुकानदार दोस्त को दुकान खोलने से पहले ही वह पकड़ लेना चाहता था। जिससे उसके फिर दुकान बंद कर, तोता लाने के लिए अपने घर जाने का झंझट ना रहे। ऐसी स्थिति में तोता दोपहर को ही उन्हें मिल सकता था, जब वह दुकानदार खाना खाने अपने घर जाता था।
लड़की का पिता जब दुकान के सामने पहुँचा तो दुकानदार उकड़ू बैठे अपनी दुकान का ताला खोलते उसे मिला।
“अरे…अरे रुको! ताला रहने दो…जाकर तोता ले आते हैं…लड़की तड़प रही है!” लड़की के पिता ने कहा।
जवाब में दुकान का शटर खर्र करता ऊपर उठा और नीली रोशनी में डूबी दुकान अपने सामानों के साथ बाहर आ गई।
दुकानदार ने मुड़कर लड़की के पिता की ओर देखा तक नहीं। वह दुकान के भीतर चला गया। लड़की के पिता को दुकानदार से वह बातचीत याद आयी, जिसमें उसे लगा था कि कुछ तो गड़बड़ है, पर जिसे उसने अपनी लड़की से छुपा लिया था। वह दुकानदार के पीछे-पीछे दुकान के भीतर घुसा।
दुकानदार पलटा तो उसके हाथ जुड़े हुए थे। उसने लड़की के पिता से कहा, “आप बैठिए जरा… आप बैठ तो जाइए!” यह कहते हुए दुकानदार के पास एक कड़वे हो गए सच को बोलने और ना बोलने के बीच काँपता-सा असमंजस साफ दिख रहा था।
लड़की का बाप काउंटर के सामने रखे एक प्लास्टिक के स्टूल पर बैठने लगा। जिस पर बैठते हुए हमेशा उसे यह भय होता था कि वह उसका वजन सम्हाल पाएगी या नहीं। अभी भी यह हुआ और कुछ देर के लिए, लड़की के पिता का ध्यान तोते से हट गया। बैठने से पहले उसने स्टूल पर जमी धूल को पोंछने के लिए, दुकानदार से एक कपड़े की माँग की। धूल रहे या ना रहे, बैठने की जगह को पोंछ कर बैठने की उसकी आदत थी और यही वह कर रहा था।
इस बीच दुकानदार थोड़ी देर दुकान के रैकों के बीच इधर-उधर होता रहा। डंडे में बंधे एक कपड़े से वह रैक में रखी वस्तुओं की धूल साफ करता-सा दिख रहा था।
तभी लड़की के बाप ने कहा, “तुम तोता ले आओ…मैं दुकान देख लूँगा…वह घर में उसका इंतजार कर रही है…” लड़की के पिता की आवाज में बेचैनी आकर बैठ गई थी।
दुकानदार अब रैक के घेरे के पास से पलटकर वापस काउंटर तक आया और चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गया। लड़की का पिता और दुकानदार दोनों अब आमने-सामने थे, बीच में एक पीले रंग काउंटर भर था जो उनके खड़े रहने पर, उनकी कमर तक आता था।
दुकानदार काउंटर पर अपनी कोहनी, टिका अपने हाथों से अपना सिर पकड़ चेहरा थोड़ा झुका कुछ सोचता रहा। उसे इस तरह सोचता देख, लड़की के पिता के भीतर बेचैनी बढ़ती गई। लड़की का पिता कुछ और कहता, इससे पहले ही दुकानदार ने, अपने हाथों में लड़की के पिता के काउंटर में फैले हाथों को लेते हुए कहा, “ शांति से मुझे सुनें…अब कैसे कहूँ…कहना तो है ही…” यह कहते हुए उसके हाथ, उसके कंधों तक जाकर तीन बार कमल के फूल बन सकते थे, पर बने नहीं। वह लड़की के पिता का हाथ थामे रहा। फिर वह थोड़ी देर के लिए चुप हो गया।
दुकानदार के सामने लड़की के पिता की सवालिया आँखें थीं, जिनकी आँच में वह बहुत देर चुप नहीं रह सकता था तो उसने कहा, “सच यह है कि आपका तोता दूसरे दिन ही अपनी चोंच से पिंजड़े का दरवाजा उठाकर उड़ चुका है…” इतना कह दुकानदार ने एक गहरी साँस ली। यह ऐसी साँस थी जो भीतर देर तक दबी किसी बात को बोल बाहर आती है। फिर उसने अपनी बात जारी रखी, “इसमें मेरी कोई गलती नहीं है…उसके उड़ते समय हम में से कोई होता तो हम उसे रोक लेते…हमने तो बस पिंजड़े का खुला दरवाजा देखा बस…वह बिल्कुल सुबह उड़ गया…मुझे लगता है वह हमारे सोकर उठने से पहले ही उड़ चुका था…अब आप ही बताएँ इसमें हमारा क्या दोष है? हम इसमें कर भी क्या सकते थे?”
लड़की के पिता और यहाँ तक की लड़की की आशंका सही साबित हो गई थी। तोता उड़ चुका था। अब वह कहाँ था किसी को पता नहीं था।
“आपने तो मरवा दिया…अब मैं अपनी लड़की से क्या कहूँ जो दो दिनों से बिना उससे बात किए पागल है और जो तोते के इंतजार में सुबह से बैठी है…शादी में भी उसके बिना बेचैन रही बेचैन रही है…वह उसे अपना छोटा भाई मानती है…आप समझें…आपने उसके भाई को खो दिया है…” लड़की के पिता ने दुःखी होकर कहा, अब उसने अपने हाथों से अपना सिर पकड़ लिया था। उसने कहा, “आप समझें! आप कहीं से भी उसका तोता लाकर दें, तभी मैं यहाँ से हिलूँगा!…मैं बिना तोते के घर जा नहीं सकता हूँ!”
दुकानदार के हाथ, लड़की के पिता की बात सुनते हुए, काउंटर रखे सामनों को जमाने लगे थे। उसके हाथ जमे हुए सामानों को जमा रहे थे। वह दरअसल अचानक पैदा हो चुकी उस विचित्र स्थिति में अपने को सहज बनाए रखने की कोशिश कर रहा था। जिससे लड़की के पिता की बेचैनी और बढ़ गई। उसने दुकानदार के काउंटर पर रखे सामानों पर नाचते हाथों को रोकते हुए कहा, “यह छोड़िए! तोते का क्या करें यह बताइए?”
“देखिए, मेरे पास दो तोते हैं, मैं एक उनमें से लाकर आपको दे देता हूँ…मैं जानता हूँ इसमें मेरी पत्नी कलपेगी जरूर…पर किया क्या जा सकता है…यही एक रास्ता है…” कुछ क्षण सोचने के बाद उसने कहा, “…या आप कहें तो आपकी बेटी की पसंद का नया तोता मैं खरीद कर उसे दे सकता हूँ…तोता मेरे पास भी है तो मैं तोते से बिटिया के प्रेम को समझ रहा हूँ…अब इसमें मेरी कोई गलती तो है नहीं…फिर भी मैं सब के लिए तैयार हूँ…जैसा आप ठीक समझें!”
दुकानदार सीधा और अच्छा आदमी था जो उस तोते की भरपाई करने को तैयार था, जिसके गायब हो जाने में उसका कोई हाथ नहीं था। जिसे रख कर उसने लड़की और लड़की के पिता पर एहसान ही किया था। यहाँ लड़की के तोते के उड़ने का दोष, लड़की के तोते को देने की जरूरत थी, ना कि दुकानदार को जो उस दोष को अपने ऊपर लेते हुए, लड़की के लिए नया तोता खरीदने को तैयार था।
आखिरकार लड़की के तोते के उड़ जाने से दुःखी दो बूढ़ों ने, आपस में मिल यह तय किया कि लड़की के पिता का बिना तोते के घर पहुँचना विस्फोटक होगा। बेहतर यह होगा है कि दुकानदार अपना एक तोता घर जाकर ले आए, जिसे लेकर लड़की का पिता अपने घर जा सके। हो सकता है कि तोते के बदले तोता देख, लड़की उतनी उग्र ना हो जितना उसके उग्र होने की उसका पिता उम्मीद कर रहा था।
दुकानदार अपनी दुकान, लड़की के पिता के भरोसे छोड़, तोता लाने अपने घर बस निकलने ही वाला था कि लड़की दुकान के सामने प्रगट हो गई। दुकानदार उससे कुछ कहता इससे पहले लड़की के पिता ने कहा, “ये उसे लेने जा रहे हैं…तुम घर जाओ…मैं उसे ले आऊँगा!”
“मैं चली जाती हूँ इनके साथ…ले आती हूँ उसे!”
“कहा ना ये ले आएँगे…तुम घर जाओ…तुम आई ही क्यों यहाँ?”
“तुमने इतनी देर लगा दी तो मैं क्या करती?”
“अब जाओ…हो गया बहुत…मैं तोता ले आऊँगा कैसे भी।”
लड़की के पिता के कहे ‘कैसे भी’ ने लड़की के भीतर पहले से बैठे संदेह को गहरा कर दिया।
“बापी सच बताओ क्या बात है?” वह अपने पिता को बापी कहती थी और पिता के चेहरे पर उभरा झूठ उसकी पकड़ में आ जाता था, चाहे वह कितनी सावधानी से क्यों ना बोला गया हो। यह इसलिए भी था कि पिता झूठ कम बोलते थे। झूठ बोलने में बहुत माहिर नहीं थे।
लड़की ने जब यह कहा तो दुकानदार का चेहरा अपना रंग खोने लगा। वह कभी पिता और कभी बेटी की ओर देख रहा था। दरअसल जब वह लड़की दुकान पर आई थी तो दुकानदार काउंटर से तोता लेने, घर जाने उठ चुका था और अब उन दोनों के बीच आ गया था। यही उसकी मुश्किल थी। वह लड़की के सामने से हटने पर ही अपनी दुकान से बाहर आ सकता था जो अपने दोनों हाथों से, दुकान के कांच के दरवाजे को खोल, उसके सिरों को पकड़े खड़ी थी।
लड़की ने दुकानदार को अपने दाहिने हाथ से बाजू हटने का इशारा किया। उसका व्यवहार दुकानदार को लेकर ऐसा था जैसे वह कोई फालतू चीज हो। उसने उसे अनदेखा करते, अपने पिता के सामने जाकर खड़ी हो गई। वह काउंटर के पास ही अब भी स्टूल पर बैठा हुआ था और उसकी चौड़ी देह के नीचे स्टूल छिप चुका था। दुकान का दरवाजा, लड़की के भीतर घुसते ही, अपनेआप दुकानदार के मुँह पर बंद हो गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे उस तोते को लेने घर जाना चाहिए या नहीं जो उसे लड़की के उड़ गए तोते के बदले में देना था।
“देखो अगर तुम शांति से सुनोगी तो मैं बता सकता हूँ!” लड़की के पिता ने अपने सामने कमर पर हाथ रख अपने को घूरती खड़ी लड़की से कहा।
“यानी कुछ गड़बड़ है…तो यह तोता किसका लेने जा रहा है?” यह लड़की का पहला बदतमीज वाक्य था जो दुकानदार के लिए उपजा था जो उसके पिता की उम्र का था और जिसका दोष सिर्फ यह था कि उसने उस लड़की के तोते को पनाह दी थी।
“यह अपना तोता तुम्हें दे रहे हैं…तुम्हारा तोता पिजड़े का दरवाजा अपनी चोंच से उठा उड़ चुका है।“ आखिरकार लड़की के पिता ने उस सच को कह दिया जो देर-सबेर लड़की को पता चलना ही था।
यह सुनते ही लड़की ने बारी-बारी से दोनों बूढ़ों को घूर कर देखा, जिसमें एक बूढ़ा उसका पिता था और दूसरा बूढ़ा उसके पिता का दोस्त वह दुकानदार था जो अपनी मित्रता के सम्मान में लड़की के तोते को रख अब फँस चुका था।
“तोते उड़ते ही हैं बेटा, उसे लेकर इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है…यह अपना तोता दे रहे हैं…” पिता ने लड़की को समझाने की कोशिश की।
“बापी फालतू बात मत करो! पिकू मेरा भाई था तोता नहीं था। मुझे अपना भाई वापस चाहिए…जिसे तुम्हारे इस साले दोस्त ने उड़ा दिया है…” लड़की बिफर पड़ी।
“देख बदतमीजी नहीं…मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा!” पिता ने अपनी लड़की को चेतावनी दी।
लड़की ने उसकी चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया, “तुम्हारे इस दोस्त ने मेरे तोते को मार डाला है…इसने यह सिर्फ जलन में किया है…मेरा तोता इसके तोते से अच्छा था और यह इस आदमी को बर्दाश्त नहीं हुआ।”
लड़की के ऐसा बोलने पर जवाब में दुकानदार ने एक शब्द नहीं कहा। वह दुकान के कांच के दरवाजे के हेंडल का सहारा लिए अब भी चुपचाप खड़ा था। बाप-बेटी को देखता। यह उम्मीद करता की पिता अपनी बेटी को समझा लेगा और यह विचित्र-सा मामला सुलझ जाएगा।
ऐसा हुआ नहीं। लड़की पिता के बस में थी नहीं। वह लगातार अपने तोते को वापस माँगते हुए, उग्र होती चली गई। वह जितनी उग्र होती गई, वह उतनी ही अपने पिता और उसके हमउम्र उस दुकानदार दोस्त के लिए बदतमीज़ होती चली गई। वह उनकी उम्र के ‘लिहाज’ से बाहर जाती चली गई। जिसे इन दो वाक्यों से समझ जा सकता था– उसने दुकानदार का पक्ष ले रहे अपने पिता से कहा कि तू मेरा बाप नहीं है। उसने दुकानदार से कहा कि मेरा तोता तू नहीं लाया तो मैं तेरी गरदन मरोड़ दूँगी। लड़की विक्षिप्त-सी लग रही थी। दुकान के आसपास भीड़ बढ़ती गई थी।
गाली-गलौज करती लड़की की उग्रता जब अपने चरम पर पहुँची तो उसने सबसे पहले काउंटर पर रखे सामानों उठाकर, दुकान की छत की ओर उछालना शुरू किया। चॉकलेट के डिब्बों के ढक्कन, छत से टकराकर खुले तो दुकान में चॉकलेटों की बारिश होने लगी…चूड़ियों के टूटने की आवाज फर्श पर बिखरने लगी…सारे काउंटर पर रखे सामानों के पैकेट उड़ने लगे…
अब तक लड़की का पिता और उसका दुकानदार दोस्त दुकान छोड़ बाहर आ चुके थे और निस्सहाय लड़की के उस तांडव को देख रहे थे जो वह दुकान के भीतर कर रही थी। उसने फ्रीजर से आइसक्रीम के डिब्बों को निकाल और फर्श पर फेंक, उन पर कूदते हुए उन्हें रंगीन कीचड़ में बदल दिया। उसने रैकों में सजे सारे सामानों को फर्श पर गिरा उन पर कूदती उन्हें तोड़ती रही। लड़की ने पागलों की तरह दुकान को कुछ ही मिनिटों में तहस-नहस कर दिया था।
लड़की उसके बाद दुकान से बाहर आई। वह तेज-तेज हाँफ रही थी। उसने अपने पिता की ओर एक नजर नहीं देखा। उसने हांफते हुए सीधे दुकानदार से कहा, “मेरा तोता ले आना और अपने दुकान के इन सामानों का पैसा मुझसे ले जाना!”
इतने नुकसान के बाद भी दुकानदार ने लड़की पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की थी। उसे पुलिस से परहेज था। इस उम्र में वह कोर्ट-कचहरी के झंझट से वह बाहर रहना चाहता था। उसने अपने मन को बहुत जल्द यह समझा लिया था कि दुकान का नुकसान तोते के उड़ने की दुगनी-तिगुनी कीमत अदायगी-सा है। इस नुकसान को बिना अपने घर वालों को बताए उसने अपनी पेंशन से पूरा किया था। घर वालों से यह कह दिया था कि नुकसान की भरपाई लड़की के पिता ने कर दी है। इस तरह लड़की पर कानूनी कार्यवाही के लिए बार-बार दबाव डाल रही अपनी पत्नी और बेटे के दबाव से वह बाहर हो गया था। बदला लेने लड़की के घर जाकर तोड़-फोड़ करने को कुलबुलाते अपने लड़के को भी रोक पाया था।
उस घटना के बाद लड़की के पिता और दुकानदार की मित्रता नहीं बची थी। लड़की का पिता किस मुँह से उसकी दुकान आता। उसने आना बंद कर दिया था। अब वह पास के एक पार्क की बेंच पर अकेले बैठा अपना समय काटने लगा था, जहाँ कुछ नए बूढ़े उसे बाद में मिल गए थे। दुकानदार और लड़की के पिता को कभी-कभी एक दूसरे की झलक दिख जाती थी तो वे उसे नहीं देखे-सा कर लेते थे। दुकानदार के यहाँ अब बूढ़ों की बैठक पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। अब यह उसकी पत्नी और बेटा नहीं चाह रहे थे कि दुकानदार दुकान में बूढ़ों की महफ़िल सजाए और उन पर दया करे और कोई तमाशा खड़ा हो जाए। सबसे खराब बात हुई थी वह यह थी कि वह दुकानदार अब उस लड़की की उम्र की लड़कियों और लड़कों से डरने लगा था, जिस लड़की के तोते को रखने के कारण, उसे यह सब भुगतना पड़ा था। उस उम्र के युवा उसकी दुकान में कुछ खरीदने आते तो वह बहुत सावधानी से बात करता। उसे लगता कि वे पता नहीं उसकी किस बात का बुरा मान जाएं और उसकी दुकान उनके हाथों तोड़-फोड़ की जद में पहुँच जाए। इधर वह दुकानदार अपने लड़के से भी डरने लगा जो उस तोते वाली जेन जी लड़की का हमउम्र था और दुकान छोड़ दिन भर पूरे शहर में, इधर-उधर जाने कहाँ भटकता रहता था। उसने पहले की तरह अपने लड़के को सवालों के घेरे में लाना बंद कर दिया था। अपने बेटे की हरकतों को देख, दुकानदार के भीतर बस एक गहरी चुप्पी जागती थी जो देर तक उसके भीतर उसे बेचैन करते ठहरी रहती थी।
इस घटना को हुए मुश्किल से माह भर भी नहीं हुए थे, एक सुबह लड़की का तोता लड़की को अपनी खिड़की पर बैठा मिला। उसके पंख कहीं-कहीं झुलस गए थे और वह बहुत थका और गंदा लग रहा था। लड़की ने उसे पुचकारते हुए उठाया और अपनी छाती से लगा लिया। उसने बहुत दिन से ‘तेरी नाक सुंदर है’ नहीं सुना था। जिसके कारण अब उसे फिर अपनी नाक बदसूरत लगने लगी थी। उसका तोता वापस आ गया था। आज से फिर उसकी नाक सुंदर हो जाने वाली थी।
लड़की का यह तोता इस बीच कहाँ-कहाँ भटका था? गया था कहाँ-कहाँ? यह तोते के अलावा कोई बता नहीं सकता था। तोता जिस दिन दुकानदार के घर से, अपने पिजड़े का दरवाजा, अपनी चोंच से उठा उड़ा था–उस दिन उसके उड़ने के पीछे कोई बहुत बड़ा कारण नहीं था। लड़की के तोते को वहाँ आए मुश्किल से एक दिन और एक रात हुए थे। इतने कम समय में वह उस जगह से ऊब चुका था। इसका कारण यह था कि वह अपने बाजू के पिंजड़ों में बंद, दुकानदार के उन दो तोतों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। उन तोतों में एक पूरी तरह बूढ़ा हो चुका था और दूसरा बूढ़ापे की ओर बढ़ चुका था। दुकानदार के दोनों तोते, बुढ़ापे की ओर फिसल गई अपनी विचित्र आवाजों में, उस लड़की के तोते को पता नहीं क्या-क्या कहते रहते थे। जिसे सुनना उस युवा तोते के लिए असंभव हो गया था। उनका कहा कुछ-कुछ उपदेश-सा था। कुछ-कुछ गाली-सा। लड़की का तोता भी बराबरी से उन्हें जवाब देने की कोशिश कर रहा था। पर उनके दो होने के कारण वह उनकी बराबरी ठीक से नहीं कर पा रहा था। इस तरह उन दो बूढ़े तोतों का कहा लड़की के तोते के लिए बर्दाश्त से बाहर होता गया था। उसे लगा यहाँ रहा तो इन बूढ़े तोतों की बातों को सुन-सुन कर ही वह मर जाएगा। सच यह था कि लड़की का तोता उन दो बूढ़े तोतों को बर्दाश्त नहीं कर पाने के कारण उड़ा था।
वह जब उड़कर दुकानदार के घर बाहर आया तो सबसे पहले लड़की के घर गया, जिसे उस तोते का घर भी कहा जा सकता था। उसने घर के सारे दरवाजों और खिड़कियों को अपनी उड़ान से टटोला और उन्हें बंद पाया। उस घर में जो उसका अपना घर था घुसने की कोई जगह तोते को नहीं मिली। एक बार उसने सोचा कि वह वापस दुकानदार के घर लौट जाए। तभी उसे वह दोनों बूढ़े तोते फिर याद आ गए। उसके भीतर वितृष्णा जागी। वह थोड़ी देर लड़की के घर की बालकनी की रेलिंग पर बैठा रहा कुछ सोचता। सोचते हुए तोते ने आसमान की ओर देखा। तभी दिखा उसे सायबेरिया से उड़कर आ रहे और पता नहीं कहाँ जा रहे बतखों का झुंड। उन्हें तोता तब तक देखता रहा, जब तक वे दिखते रहे आसमान में ऊपर उड़ते और पार करते आसमान का वह टुकड़ा जो लड़की के तोते की दृष्टि के घेरे के भीतर था। शायद बतखों के इसी झुंड को देख तोता उत्साहित हो गया था। उसने एक लंबी उड़ान भरी जो उसके उड़ते-उड़ते थकने तक लंबी थी और जिसके पास फिलहाल कोई दिशा नहीं थी। उसे अपनी थकान भर सात लंबी उड़ानों के लगभग पूरी होते ही बहुत महीन कुछ मनुष्य-ध्वनियाँ सुनाई दीं जो पता नहीं कितनी दूर से उस तक आ रही थीं। लड़की का तोता उस ध्वनि की दिशा में अपनी उड़ान को लेता चला गया।
उन मनुष्य-ध्वनियों की दिशा में बढ़ते-बढ़ते उसे अपनी थकान तक कई लंबी उड़ाने लगीं। लगे कई दिन। पर वह उस ओर बढ़ता चला गया। जब लड़की का तोता उन सामूहिक मनुष्य-ध्वनियों के पास पहुँचा जो अब उसके लिए भीषण शोर में बदल चुकी थीं। शोर जिन शब्दों का था, वे नेपाली भाषा में जोर-जोर से हाथ उठा-उठा कर लिए जा रहे नारे थे—सोशल मीडिया बंद होइन भष्टाचार बंद गर (सोशल मीडिया बंद नहीं भ्रष्टाचार बंद करो!)…गोली खान्छौं तर फेसबुक र यूट्यूब चलाऊँछौं (गोली खाएँगे पर फेसबुक और यू ट्यूब चलाएंगे!)… ह्यासट्याग हाम्रो हतियार हो (हैश टैग हमारा हथियार है!) … न्याय चाहियो, अहिले चाहियो (न्याय चाहिए, अभी चाहिए!)…नेता होइन नीति चाहियो (नेता नहीं नीति चाहिए!)…पुरानो राजनीति चाहिँदैन (पुरानी राजनीति नहीं चाहिए!)…जेन जी उठिसक्यो (जेन जी जाग चुकी है!)…हामी भविष्य हौं (हम भविष्य हैं!)….
आसमान तक उठते ऐसे नारों की आवाजों में, लड़की के तोते ने अपने को जेन जी की विशाल भीड़ के बीच पाया। वह ठीक उस समय वहाँ पहुँचा था, जब जेन जी युवा, नेपाल के संसद भवन के सामने लगे बेरीकेटों को गिराता, सुरक्षा बालों से जूझता आगे बढ़ रहा था। टियर गैस के गोले जो जो उनकी ओर दागे जा रहे थे, उन्हें वे वापस सुरक्षा बालों की ओर फेंकते दिख रहे थे। सुरक्षा बालों की चलाई गोलियों की आवाज, नारों की आवाज के नीचे दब रही थी। जेन जी में कुछ गोली खा गिर रहे थे। कुछ टीअर गैस की चपेट के बाद घुटनों पर सिर रखे बैठ गए थे। पर ज्यादा वे थे जो सारी बाधाओं को पार करते संसद भवन की ओर आगे बढ़ रहे थे। चारों तरफ आपाधापी मची हुई थी। वह जेन जी युवाओं का अपार जन समूह था। तोते ने उस समूह को अपनी उड़ान से नापने की कोशिश की। पर वह बीच से ही लौट आया। यह समझना फिलहाल उस तोते के लिए मुश्किल था कि कौन किस ओर भाग रहा है? कौन किसलिए चिल्ला-चीख कर रहा है? कौन किस पर किस हथियार से वार कर रहा है? कौन किसके किस हथियार का वार खा रहा है।
जेन जी संसद भवन के सामने की सड़क पर जितनी दूर तक देखो, उतनी दूर तक दिख रहे थे। कई युवाओं के हाथों में नेपाल के झंडे थे लाल दो जुड़े हुए तिकोनों में, नेपाल के अनंतकाल तक अस्तित्व के निशान सूर्य और चंद्रमा को लिए। झंडों के लाल रंग में लहरा रहे थे सफेद सूर्य और सफेद चंद्रमा। लहराते चंद्रमा और सूरज से नारे फूट रहे थे, जिनका रंग लाल था। झंडे का नीला किनारा जो शांति का प्रतीक था, काला पड़ता जा रहा था। नीले रंग को इतनी तेजी से काला होते और लाल को लहू होते लड़की का तोता देख रहा था। जेन जी के नारों से ही नेपाल का झण्डा लहरा रहा था।
बेरिकेट के गिर जाने के बाद, अब जेन जी संसद भवन के दरवाजों को हजारों की संख्या में घेरे दिखे। देखा लड़की के तोते ने युवाओं को संसद की चहारदीवारी फलाँगते हुए सैकड़ों की संख्या में। उसने उन युवाओं को संसद भवन में तोड़-फोड़ करते देखा। देखा संसद भवन के लोगों को, जेन जी के वार से बचने भागते इधर-उधर। जेन जी के कंधों पर उसने संसद की टीवी, एसी, कुर्सी, टेबलों आदि की लूट देखी। वह उन युवाओं के साथ खुश-खुश उड़ता उन्हें दिखा जो टीवी एसी कुर्सी टेबल जैसे संसद के सामानों को अपने कंधों पर उठाए बाहर आ रहे थे। एक बार जेन जी के कंधे भरे लूट के सामानों से तो लूट की जगहों का विस्तार होता गया। वे उन सामानों तक बेधड़क गए जो उनके घर में नहीं था और नहीं था उनकी देह पर–जो था सिर्फ नेताओं और उनके बाल बच्चों के पास। वे वह सब लूट कर पाना चाह रहे थे। वे नेताओं के सामानों भरे घर को खाली कर देना चाहते थे।
लड़की के तोते को यह सब इतना अच्छा लगा की वह उन युवाओं के उस आंदोलन में शामिल हो गया। किसी जेन जी आंदोलनकारी युवा ने उस समय यह ध्यान नहीं दिया था कि एक तोता अपने पंख फड़फड़ता और उनके नारों को दोहरता उनके आंदोलन में शामिल है। एक तोता उनकी लूट पर खुश है। एक तोता उनके उन हमलों पर खुश है, जिससे बचने नेता अधिकारी इधर-उधर भाग रहे हैं, फिर भी बच नहीं पा रहे हैं।
लड़की का तोता संसद भवन की आग से लेकर, नेपाल के मंत्रियों से मारपीट और उनके घर जलाए जाने में भी लगातार जेन जी नेपाली युवाओं के साथ शामिल रहा। उसके इस अतिउत्साह के कारण उसके पंख कई बार झुलसे। नेपाली युवाओं का गुस्सा वर्तमान से पूर्व नेताओं तक फ़ैला हुआ था। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री के घर को लड़की के तोते ने जलते देखा। देखा असहाय पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी को लपटों में घिरे। जेन जी युवाओं के नारों के बीच भवन के बंद दरवाजों के पीछे उसने उस जिंदा जलती औरत की चीखों को सुना। उस जलती औरत की चीखों को सुन, लड़की के तोते ने अपने भीतर कुछ महसूस नहीं किया, जैसा कि उस युवा जेन जी समूह ने कुछ महसूस नहीं किया।
लड़की को उसी दिन, जिस दिन तोता घर लौट था यह अंदाज हो गया कि वह नेपाल से लौटा है। दरअसल अब उसका तोता बीच-बीच में, बिना किसी वजह नेपाली भाषा में नारे लगाने लगा था जो वह नेपाली जेन जी युवाओं से सीख आया था। यह कई दिनों तक चला। चलता रहा। लड़की को इस घालमेल में यह बात जरूर अच्छी लगी थी कि उसका तोता उसे ‘तेरी नाक सुंदर है’ बोलना नहीं भूला था।
अब लड़की रोज अपने तोते से ‘तेरी नाक सुंदर है’ सुन सकती थी। वह सुनती रही। वह कई दिनों तक सुनती रही। आखिर एक दिन उसका तोता फिर गायब हो गया। दरअसल यह लड़की को यह पता ही नहीं था कि उसके तोते को सुदूर से आती अब जेन जी के आंदोलन की ध्वनियाँ सुनाई देने लगी थीं। वे ध्वनियाँ उसे किसी नशे-सी अपनी ओर खींचने लगी थीं। वे ध्वनियों लड़की के तोते को बार-बार खींचती रही और लड़की का तोता जिसक नाम पिकू था, जेन जी के आंदोलनों में शमिल होने मोरक्को, पेरागुए, तिमोर-लेस्ते, मलेशिया, केन्या, बांग्ला देश, ईरान जैसी जगहों के लिए उड़ान भरता रहा। वह इन उड़ानों के लिए लड़की के घर से बार-बार गायब होता रहा।
लड़की को अपने तोते के गायब हो जाने और गायब होकर महीने-डेढ़-दो महीनों बाद वापस आ जाने की अब आदत पड़ गई थी। अब वह तोते से ‘तेरी नाक सुंदर है’ सुनने के लिए, तोते के इन गायब दिनों के खत्म होने का धैर्य से इंतजार करने लगी थी। तोते के गायब दिनों में लड़की को अब अपनी नाक बदसूरत लगना बंद हो चुकी थी। लड़की जानती थी कि जैसे ही तोता लौटेगा सबसे पहले उससे ‘तेरी नाक सुंदर है’ कहेगा। बाद में वह उस देश के नारे उस देश की भाषा में चीख-चीख कर घर भर में कई दिनों तक शोर मचाएगा। लड़की जान गई थी तोता उस देश के नारों को तब तक नहीं भूलेगा जब तक किसी और देश में चल रहे जेन जी आंदोलन में शामिल होने वह उड़ान नहीं भरता और वहाँ से उस देश की भाषा में नारे उठाकर नहीं ले आता।
लड़की को तोता मिल गया था। भले ही थोड़े बदले हुए स्वभाव के साथ वह मिला था, पर मिल तो गया ही था। तोते के मिलने पर उस लड़की को उस बूढ़े दुकानदार से अपने उस दुर्व्यवहार के लिए माफी माँगनी चाहिए थी जो उसने माँगी नहीं थी। ना ही इस बारे में उसने सोचा था : वह एक जेन जी लड़की थी।
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